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बारिश


 बारिश..
 कितना कुछ सिमटा हुआ है
 इस एक शब्द में...
मौसम का बदलाव ,
मिट्टी की सौंधी खुशबू..
लहलहाती फ़सलें और हरियाली..
भड़ास निकालते गरजते बादल...
कौंधती बिजली
कौन जाने कितना कुछ 
समेटे हैं अपने भीतर
सिहर जाती हूँ मैं ये सोचकर..

मौसम की पहली बारिश में भीगते ही 
न जाने कितनी उम्मीदें ,कितने सपने,
कितनी यादें और कितने एहसास
डबडबाई आँखों में 
पल भर में झिलमिलाने लगते हैं ..
सब कुछ अपने भीतर 
समेटे आती है ये बारिश..
बरसती है,भिगाती है,
घर का आँगन
भीतर ही भीतर कुछ कहता है मन
न जाने कितनी यादें ..

और बस !
 बरसने लगती है बारिश ..
रिमझिम ..
सकुचाती, सहमी हुई  बारिश ..
सूनी सड़कों पर 
बारिश से बचते लोग
क्या कभी समझ पाएंगे
क्या कहती है ये बारिश!?
~~ पायल ~~ 

उलझन....

ना जाने क्यूँ यह ख्याल आया
और अंतस में घर कर गया
दूर पड़ा एक कागज़ का टुकड़ा
कुछ सुनी हुई कहानियाँ सुना रहा था
अपने हाथ में उठा कर
अपनी हथेली से दबाकर
उसकी सिलवटों को हटाया
और गौर से देखा
तो परछाइयों में क़ैद
छटपटाता हुआ एक साया नज़र आया
जो अनायास ही चीखने चिल्लाने लगा

वो देखना चाहता था
अपनी आँखे मूँद
महसूस करना चाहता था
रुकी हुई धड़कन को
उड़ना चाहता था
पंछियों के संग
गाना चाहता था
कुछ अनसुने गीत
पहचानना चाहता था
ख़ुद को..

पर बदली हुई गति
से आख़िर बदल ही गया वो साया
अंधेरों में भी
महसूस कराता था जो अपना वजूद
आज सिलवटों में लिपटा हुआ
अधूरा सा दिखता है अब
पड़ा हुआ है कहीं दूर
अंधेरों में ढूंढता है अब अपना वजूद..
ना जाने क्यूँ यह ख्याल आया
और अंतस में घर कर गया !
~~पायल~~

सपना क्या है??

सपना क्या है?
एक ख्याल ही तो है
कभी आंखों में पलता हुआ
कभी दिलों में जलता हुआ
कभी आंसुओं में ढलता हुआ
कभी खुशियों में मुस्कुराता हुआ
कभी सोते से जगाता हुआ
कभी गहरी नींद में सुलाता हुआ
एक साया सा?
जो ख्यालों में गहराता जाता है
और ख़ुद में इतना समा जाता है
की इंसान जकड़ा रह जाता है
जब किसी का सपना टूटता है
तो कैसा लगता है?
कांच के टूटे टुकड़ों की तरह
क्या आंखों में चुभता है?
या फिर एक लम्बी रात की तरह
अंधेरों में ही बसता है?
और मानव मन ख़ुद ही रोता है
तो कभी ख़ुद ही ख़ुद पर हँसता है
हर सपने की भी कीमत होती है शायद
हकीक़त की धरा से टकराकर
क्या सपना अधूरा रह जाता है
और अपनी कीमत चुकाता है?
सपना सिर्फ़ सपना होता है
पर हाँ, खुशी का या गम का
एक लम्हा वो अपना होता है….
~~पायल~~

जीवन चक्र

एक ठूंठ
सड़क के बीचों बीच खड़ा
जूझता हुआ अपने आज से
दीमक का घर सा
बीते हुए कल की सुनहरी यादों में
जीता है अपने जीवन को

जब चिडियाएँ चहचहातीं थीं
घोसले बनाती थीं
उन हरी भरी डालियों पर
कभी सावन के झूले पड़ते
कभी प्रेम के रंग दिखते
तो कभी अलगाव का गम
कभी ओस की बूँदें टपकती
कभी सावन की बूँदें सजती

वह जो करता जीवन अर्पण
आसरा देकर पथिकों को
कभी सुनता सूखे पत्तों की सरसराहट
तूफानों से जूझता हुआ
खड़ा रहता अडिग, निःस्वार्थ

यह वृद्ध ठूंठ
असहाय,निर्बल
अपनी ज़मीन को छोड़ता हुआ
अपने इर्द-गिर्द नए जीवन
को ढूंढता है

फैली हुई उसकी जड़ों में से
फूटी कोपलें
एक सुखद एहसास दिलाते हुए
चैन की नींद सुलाती हैं..

पास खड़ा हुआ एक
लहलहाते वृक्ष में
देखता है अपना आने वाला कल….
और सोचता है अपना बीता हुआ कल ....

~~पायल~

अन्तर्द्वन्द्व

भरा हुआ है इस दिल में गुबार इतना
मानो ज्वालामुखी में उफनता लावा जितना
डोलती जा रही है धरती, गिर रही हैं चट्टानें
तहस नहस न हो जाए सब, सोचता मन क्यों इतना
टूटा जाता है अब बाँध सब्र का इतना
गूंजती हुई हैं खामोशियाँ, सहमी हुई हैं दिशायें
अंतर्मन से रिसता लहू है, यह मन डरता क्यों इतना
पूछो इन वृक्षों से है सहा प्रहार कितना
एहसास की तपन ,झुलसती हुई हैं आशाएं
बीते पतझड़ की आग को, रे मन क्यों याद करे इतना
सावन की शीतल लहरों ने बुझाना भी चाहा कितना....

~~ पायल~~

जुगनू


एक जुगनू अँधेरी रात में सलीका सिखा गया
अंधेरों को रोशन करने का तरीका बता गया......
अंतस की ज्वाला को प्रज्वलित करते हुए
एक चिंगारी को जैसे शोला बना गया......
अनजानी भीड़ में ख़ुद को तलाशते हुए
ख़ुद से ख़ुद की पहचान करा गया.......
अनचाहे गिले शिकवे भुलाते हुए
कुछ भटकते हुए सवालों के जवाब बता गया.......
फिर मंद ही मंद मुस्कुराते हुए
आस का एक बुझा हुआ दीपक जला गया........
~~पायल~~